लोग तीन तरह के होते है, सही, गलत और आशिक। क्योकि सही गलत अकल की बाते है, आशिकी में तो ‘अक्ल के परदे पीछे करने ‘ पड़ते है. कुंदन ने भी वही किया जब उसे जो लगा। जोया की भी अपनी परवरिश थी अपनी उम्मीदे और अपनी उड़ान।जिसमे कुंदन नहीं आता। अकरम आता है। कोई भी कुंदन , जोया को चाहे मासूमियत से चाहे, बेखुदी से, या पागलपन से वो जोया को प्यार नहीं करवा सकता। जैसे बिंदिया नहीं करवा पायी। इश्क करना आपके बस में है, करवाना नहीं।

फिल्म पर आते है। धनुष को पहले मैंने ‘3’ (कोलावरी दी फेम) में देखा है. अभिनय के मामले में वो कइयो के पिता है . चेहरे के एक्स्प्रेसन क्षणों में बदलते है और आँखे तो गजब है. अगर समय मिले तो ‘3 ‘ जरुर देखे.

निर्देशन गजब का है. आनंद ने इसके पहले ‘तनु वेड्स मनु’ बनायीं थी। इससे ये बात तो तय है की उन्हें रिश्तो की समझ बहुत गहरी है. फिल्म के फर्स्ट हाफ का मासूम रोमांस दुसरे हाफ में कई रूप में बंट जाता है -नफरत, अपराध बोध, बदला और परिपक्व प्यार। अभिनय हो, गाने हो या संवाद, कोई फिल्म के लय को नहीं तोडते। पिक्च्राइजशन परफेक्ट है खास तौर पर होली के सीन्स .

 

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