सिनेमा में स्त्री हाशिये पर है, तो स्त्री कितनी ज़िम्मेदार?

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एक बांग्ला सिनेमा को यदि विलग कर दिया जाये, तो भारत में अन्य किसी भाषा के सिनेमा में सशक्त स्त्री की छवियों अथवा सार्थक स्त्री विमर्श का या तो अभाव ही है या यह हाशिये पर है।

हिन्दी सिनेमा में कुछ चित्र हैं जिनका नाम इस विषय में ज़रूर लिया जाएगा लेकिन मुख्यधारा अथवा बहुतायत के सिनेमा में यह विषय एक तरह से सिरे से ग़ायब है।

विचारणीय यह भी है कि क्या पूरा दोष पुरुष प्रधान समाज एवं मानसिकता पर थोप दिया जाना ही उचित है या इस पहलू पर भी ग़ौर किया जाना ज़रूरी है कि स्त्री ने अपने दायित्व कितने निभाये और कितने निभाने में नाकाम रही?

सिनेमा में परदे पर नज़र आने वाली किसी स्त्री कलाकार के बारे में यह एक तथ्य ग़ौरतलब है कि उसका दौर 15-17 साल से अधिक का अपवाद स्वरूप ही होता है। इस अवधि के बाद वह चरित्र भूमिकाओं में स्वीकारी जाती है, मुख्य नायिका के तौर पर अक्सर नहीं। जबकि पुरुष कलाकार मुख्य नायक के तौर पर 30 बरस से ज़्यादा यानी स्त्री की अपेक्षा दोगुना समय पाता है।

ऐसे में, स्वयं को स्थापित करने से लेकर अपनी शर्त रखने की स्थिति में कोई अभिनेत्री कितने और कैसे समय में पहुंचती है, यह एक महत्वपूर्ण बिंदु होता है। दूसरी बात, पुरुष प्रधान एक क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने के संघर्ष किन स्तरों पर होते हैं, इस सवाल का जवाब कई तहों में छुपा है जिसे पाने के लिए पेचीदा रास्तों से गुज़रना होता है।

हिंदी सिनेमा में बहुत शुरुआत से नज़र डालें तो स्त्री प्रधान पहली सशक्त फिल्म मिलती है वी शांताराम निर्देशित दुनिया न माने जो 30 के दशक के मध्य में एक सफल फिल्म रही थी। इसका मराठी संस्करण कुंकूं के नाम से भी शांताराम ने बनाया था। शांता आप्टे ने इस फिल्म में मुख्य भूमिका निभायी थी और शांता आप्टे की आत्मकथा ज़ाउ मी सिनेमात संभवतः किसी महिला फिल्म कलाकार द्वारा लिखी गयी पहली आत्मकथा भी है। सिनेमा में प्रवेश करने और स्थापित होने के संघर्ष की दास्तान है शांता की आत्मकथा। शांता जैसी अभिनेत्रियों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है जिन्होंने अपने स्वाभिमान को ताक पर नहीं रखा और अपने मूल्यों एवं कलात्मक गुणों के आधार पर अपना स्थान सुनिश्चित किया।

50 के दशक के बाद हिंदी सिनेमा ने कुछ फॉर्मूले खोजने की तरक़ीब को समझा और हिंदी सिनेमा के स्वर्णकाल के समाप्त होते-होते सिनेमा में कई कोणों से बदलाव दिखने लगे। इन बदलावों में एक यह भी था कि स्त्री को हाशिये पर धकेला जाने लगा था। नायिका के पात्र अब सशक्त नहीं दिख पाये और बहुत जल्दी अभिनेत्री को केवल सौंदर्य एवं मनोरंजन मात्र की प्रतिपूर्ति के लिए उपयोग में लाया जाने लगा।

जब हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा ने बाकी ज़रूरी पहलुओं के साथ ही स्त्री विमर्श को नज़रअंदाज़ करना शुरू किया तब एक अलग प्रकार का सिनेमा अस्तित्व में आया, जिसे समानांतर, कला अथवा नयी धारा के सार्थक सिनेमा का नाम दिया गया। इस सिनेमा ने कई प्रकार के विमर्शों के बीच स्त्री विमर्श को बनाये रखा और समय-समय पर बेहद सशक्त मौजूदगी दर्ज करता रहा। इस संबंध में जनसत्ता के एक आलेख में सुश्री रमा ने उचित लिखा है –

हिंदी सिनेमा में स्त्री-विमर्श को जो स्पेस मिला, उसमें समानांतर सिनेमा की बहुत बड़ी भूमिका है। ऐसा पहली बार हुआ कि जब स्त्री समस्याओं को उसी तरीके से दिखाने की कोशिश की गई जिस तरह की जेनुइन समस्याएं उनकी हैं। …पहले, मुख्यधारा की फिल्मों- मदर इंडिया, औरत, साहब बीवी और गुलाम, पाकीजा आदि में भी स्त्री जीवन के यथार्थ को दर्शाया गया है। लेकिन, यह फिल्में एक रूमानी भावुकता के साथ खत्म होती हैं। समानांतर सिनेमा उसके आगे की कड़ी है।

इसके बाद, सिनेमा का वर्तमान दौर है जिसमें स्त्री विमर्श यदा-कदा परदे पर बना हुआ है। कहना चाहिए कि स्त्री विमर्श और आगे के सोपानों को छू रहा है। अब स्त्री की दैहिकता, लैंगिकता के साथ ही उसकी मनोवृत्तियों, उसके सामाजिक सरोकारों और उसके स्वतंत्र विचारों जैसे विषयों पर कुछ फिल्में सार्थकता के साथ हस्तक्षेप कर रही हैं।

लेकिन, यहां से शुरू होती है ज़िम्मेदारी की बात। तबसे अब तक, सिनेमा का व्यापार एवं निर्माण एक तरह से पुरुषों के हाथ में रहा है इसलिए स्त्रियों को पूरी तरह से दोषी नहीं ठहराया जा सकता, न ही हमेशा उन्हें कमज़ोर कहा जा सकता है। फिर भी, पिछले कुछ समय से, जिसे हम आधुनिक समय कहें, स्त्रियों की भूमिका बड़े फलक पर देखी जा रही है। ऐसे में, स्त्रियों ने अपना दायत्वि कैसे निभाया है? यह विचारणीय है।

कुछ समय पहले, आमिर खान द्वारा प्रस्तुत किये जाने वाले टीवी शो की एक कड़ी में सिनेमा में स्त्रियों के प्रति असंवेदनशीलता, सिनेमा में स्त्री को एक प्रोडक्ट के तौर पर पेश किये जाने और सिर्फ एक कमोडिटि मानकर स्त्री देह व सौंदर्य को बेचने जैसे विषयों पर विमर्श किया गया था जिसमें दीपिका पादुकोण एवं कंगना रनौट जैसी अभिनेत्रियों ने शिरकत की थी।

इस शो में दीपिका ने बड़ी बातें और बड़े वादे ज़रूर किये थे लेकिन, वह आने वाली फिल्मों में इन बातों का कितना ध्यान रख सकीं, यह जगज़ाहिर है। इस समय की सबसे बड़ी महिला स्टार होने के बावजूद वह स्त्रियों के सशक्तिकरण को लेकर सिनेमा में क्या योगदान दे पा रही हैं? यह चिंता का विषय है। केवल दीपिका ही नहीं, उनके समकक्ष अन्य भी। इस संबंध में, वरिष्ठ लेखिका सुधा अरोड़ा अपने लेख में लिखती हैं –

आज कम कपड़ों में आइटम सॉन्ग करने के लिए हेलेन और बिंदु की तरह सिर्फ़ राखी सावंत या मलाइका खान की ज़रूरत नहीं रही। उसके लिए करीना कपूर, ऐश्वर्या राय, कैटरीना कैफ़ या विद्या बालन तक, जो अपनी शर्तों पर किसी भी रोल को अस्वीकार करने की कूवत रखती हैं, चालू और उत्तेजक किस्म के आइटम सॉन्ग के लिए अपने को सहर्ष प्रस्तुत कर देती हैं।

ऑडियंस की डिमांड और स्क्रिप्ट की मांग जैसी जुमलेबाज़ी को महिला कलाकार कहां तक नकार पाती हैं जबकि वे कहां तक नकार सकती हैं, इस बिंदु को समझना होगा।

यह भी कितने क्षोभ की बात है कि करियर की सफलता या महत्वाकांक्षा के चलते एक जुमला उछलता है कि सिनेमा के परदे पर सिर्फ शाहरुख़ खान बिकता है या सेक्स। और चिंता की बात यह है कि यह एक महिला की ओर से आता है और कुछ महिलाएं इसके समर्थन में आती हैं।

स्त्री विमर्श में बेशक, सेक्स संबंधी विमर्श एक महत्वपूर्ण बिंदु है लेकिन सेक्स को बाज़ार के संबंध में, सिर्फ एक प्रोडक्ट के तौर पर बेचने के लिए सिनेमा में उत्तेजना भरने के लिहाज़ से शामिल किया जाना और इसके लिए महिला कलाकारों की मुखर सहमति होना वाकई विचार करने पर मजबूर करता है।

एक अन्य पहलू यह है कि महिला कलाकारों ने परदे के पीछे निर्माण और निर्देशन की बागडोर भी संभाली है और निस्संदेह कुछ अच्छे चित्र परोसे भी हैं। फिर भी, इन महिलाओं से जिस स्तर पर या जिस गंभीरता की अपेक्षा की जा सकती है, उस पर यहां भी स्त्रियां एक तरह से खरी नहीं उतरी हैं।

ज़ोया अख़्तर कमर्शियल फिल्मों में यक़ीन रखती हैं, पूजा भट्ट स्त्री की दैहिकता और मांसलता के इतर बहुत कम कुछ दर्शा पाती हैं और रीमा कागती या किरण राव का काम व दृष्टिकोण अभी खुलकर आना शेष है। पिंक, क्वीन, बनारस जैसी सार्थक एवं स्त्री विमर्श प्रधान फिल्में अब भी किसी महिला निर्देशक की ओर से नहीं आ रही हैं, इसे कैसे समझा जाना चाहिए? फिर भी, मीरा नायर, दीपा मेहता और नंदिता दास जैसी कुछ महिला निर्देशकों का हस्तक्षेप महत्वपूर्ण एवं सराहनीय रहा है।

सिनेमा व्यवसाय को समझना, उसका जन तक पहुंचना और उसका निर्माण आदि हर कठिन या पेचीदा समझा जाना वाला हर काम तकनीक के इस दौर में सरल हुआ है। ऐसे में, महिला कलाकारों की जागरूकता पूरे परिदृश्य में रेखांकन योग्य बदलाव ला सकती है। आवश्यकता है केवल महिला कलाकारों की दृढ़ इच्छाशक्ति एवं एकजुटता की।

पुरुष के खिलाफ होना स्त्री की स्वतंत्रता होना नहीं है, बल्कि पुरुष के साथ सामरस्य एवं समानता के बोध को लेकर सामंजस्य स्थापित करना ही स्त्री हित में है। सुश्री असीमा भट्ट सिनेमा में औरत विषयक लेख में लिखती हैं –

सारे महान सिनेमा पुरुषों द्वारा, महान पेंटिंग पुरुषों द्वारा, महान उपन्यास पुरुष लेखकों द्वारा रचे गए लेकिन यह सब ऐसी ही है जैसे तमाम दावों के वावजूद कि हम औरत के दर्द को, उसकी आत्मा को समझते हैं, हमसे अच्छा और ज्यादा स्त्रियों को कोई समझ ही नहीं सकता लेकिन सच तो यह है कि पुरुषों ने उनको वैसे ही गढ़ा है, रचा है या जन्म दिया है जैसे – Giving birth a child without labor pain

 

असीमा जी के इस वाक्य को मैं स्त्री का दुख या क्षोभ मान सकता हूं। साथ ही, महिला कलाकर इससे प्रेरणा ले सकें और इसे चुनौती के रूप में स्वीकार कर सकें तो बेशक सिनेमा में औरत की भूमिका को लेकर और बेहतर, और सकारात्मक बिंदु हम प्राप्त कर सकते हैं। पुरुषों द्वारा रचे गये स्त्री चित्रों की आलोचना करने से यह सिद्ध नहीं होता कि स्त्री द्वारा रचे गये स्त्री चित्रों का महत्व या कलात्मक अवदान अधिक है, ठीक जिस तरह आप एक लकीर को मिटाकर अपनी लकीर को बड़ा नहीं साबित कर सकते। औसत, अनुपात आदि के आधार पर हर क्षेत्र की तरह स्त्रियां इस क्षेत्र में भी कम ही हैं, शायद होंगी भी, लेकिन जो हैं, उनकी चेतना एवं प्रतिबद्धता अहम है। वे अपने दायित्वों के उचित निर्वहन से ही तस्वीर बदलने की रूपरेखा रच सकती हैं।

-भवेश दिलशाद