जैसे भूकंप के झटके के थोड़े से अनुभव मात्र से हम बाहर भागते है और फेसबुक पर अपडेट करते है, ठीक उसी तरह लोग तनु वेड्स मनु रिटर्न्स को देखने सिनेमा हाल की तरफ भाग रहे है और फेसबुक पर अपडेट कर रहे है. ये एक अपने आप में अनोखी फिल्म है जिसे लोग देख भी रहे है और और उससे भी ज्यादे की बता भी रहे है की वो देख रहे है. आखिर ऐसा क्या है इसमें !! आईये समझते है:-

राज कपूर से लेकर ऋषि कपूर, राजेंद्र कुमार इत्यादि ने प्यार को बड़े बेसिक तरीके से हमें बताया. एक पेड़ है. हरा भरा मैदान है. शालीन पहनावा है. दो ‘व्यक्तित्व’ है. और उनके बीच प्यार है. जो होता है किया नहीं गाया है. इन्होने हमें यही बताया की प्यार ‘होता’ है.

जब यश चोपड़ा और यश जौहर जी आये तो उन्होंने प्यार को मेलोडीयस बना दिया. (ये DDLJ के बाद का समय था) . प्यार में चार्म आ गया. उन्होंने बताया प्यार तब होता है जब लेडिज दुपट्टा हीरो के चेहरे पर आता है. सरसों के खेत काफी वैज्ञानिक प्रभाव छोड़ते है प्यार के क्रियान्वयन पर. प्यार की मात्रा में बढ़ोत्तरी करनी हो तो स्विट्ज़रलैंड या पेरिस की लोकेशन होनी चाहिए. इन लोगो ने बताया की प्यार का होना तो ठीक लेकिन अगर आप धृष्ट है, बास्केटबाल खेलना जानते है, स्टड है, तो प्यार ‘किया’ भी जाता है. इस प्रकार इन्होने प्यार को संज्ञा से क्रिया बना दिया.

इसी दौरान दूसरी तरफ भट्ट कैम्प के लोग दिन रात अपनी सिनेमा की प्रयोगशाला में प्यार की दिशा में नयी खोज के लिए प्रयासरत थे. मेहनत रंग लायी और फिर रिलीज हुई फिल्म- कसूर. आफ़ताब शिव दासानी और लज्जा रे अभिनीत ये फिल्म भट्ट कैम्प के अनवरत प्रयासो का रिजल्ट थी. इनकी खोज ये थी की मानव शरीर में प्यार, सेक्स के हारमोंस के श्राव से होता है. और ये हारमोंस प्रवाहित नहीं होते बल्कि फ़ौवारे की तरह श्रावित होते है और प्यार में हर प्रकार के दुसरे मानको के प्रभाव को निश्रिय कर देते हैं. और इस प्रकार ६ पैक एब्स और गठीले शरीर के युवको, आईरिस मोबाइल की तरह स्लिम-ट्रिम-सेक्सी युवतियों के साथ साथ शिलाजीत कम्पनी के निर्माताओं के मनोबल को बल मिल गया. जिम की मशीनों की जंग छूटनी शुरू हो गयी. और प्यार अपनी नयी दिशा में अग्रसर हो चला. और सम्भोग ने बेडरूम से ड्राइंग रूम तक का सफ़र तय कर दिया.
यहाँ प्यार की ‘क्रिया’ को सेक्स के ‘विशेषण’ के साथ जोड़ दिया गया. अद्भुत प्रयोग था यह.

इस प्रकार उपरोक्त दोनों प्रयोगों से एक फार्मूला तैयार हुआ जो इस प्रकार है-

X+(Y-Z)+(5*A)+ 2*I+ D*H= SUCCESS
SUCCESS+C= SUCCESS GUARANTEED

[WHERE, Smart six-pack-abs hero six feet tall= X, Sexy heroin= Y, Cloths= Z, Foreign Locations = A, Item Song = I, Dirty Words= D, Dialogue = H, Comedy = C]
और फिर इस प्रकार फार्मूला बेस्ड फिल्मो का निर्माण कार्य प्रगति पर हो चला. कई निर्देशक, निर्माताओं के साथ आये और अनगिनत फिल्मो का निर्माण कर डाला.
इसका नुकसान ये हुआ की विलेन का काम ख़त्म हो गया और प्यार दिशा विहीन हो गया. साथ ही साथ प्यार ‘करने’ वाले भी.

इस बीच अगर आपको वापस वही मिट्टी की खुशबु वाला बेसिक प्यार देखने को मिले, तो अच्छा लगता है. प्यार जो अदरक की तरह दिखने वाले को भी हो सकता है, प्यार जो कानपूर की बिजली के तारो से भरी गलियों और हरियाणा के गाँव के किसी घर की छत पर रखे खटिया के ऊपर बिछाए सामियाना के गद्दे पर भी होता है. प्यार में यहाँ हम अपने लोगो से घिरे हुए है. यहाँ सिर्फ इन्सान है, उनके एहसास है, माँ-बाप है, दोस्त है, इंसानी रिश्ते है और बाकी सब बेमानी है. यहाँ प्यार हो रहा होता है! कंभी कभी तो पता भी नहीं चलता. यहाँ प्यार एक संबोधन है. जो रिश्तो को पुकारने की तरह है.

प्यार के अलावा जो चीज मुझे अच्छी लगी वो थी कुसुम सांगवान के रूप में महिला सशक्तिकरण का वास्तविक दर्शन. जो तनु के महिला सशक्तिकरण से अलग है. कौन सा सशक्तिकरण वास्तविक है वो उस सीन में ही देखा जा सकता है जब वो पहली बार आमने सामने आती है. सिर्फ एक छोटे से दृश्य और संवाद में महिला सशक्तिकरण से जुडी सारी भ्रान्तिया तोड़ वास्तविकता सामने ला दिया है आनंद जी ने.
तनु वेड्स मनु, रान्झाना और फिर तनु वेड्स मनु रिटर्न्स- एक तो इंसानी एहसास वैसे ही बिखरे हुए होते है, उसपर से उनपर फिल्म बनाना, फिर किरदारों को बढ़ा कर और बिखेर देना, और फिर एक धागे में समेट लेना.- आनद आप ग़जब हो!
और कंगना आप ग़जब हो गयी हो!!
और माधवन: एक ठहरे हुए चेहरे पर तरह तरह के गहरे भाव देना और पूरी दो फिल्मो में ऐसे किरदार से एक बार भी बाहर ना निकलना, आसान नहीं होता. और जहाँ तक सहायक किरदारों का सवाल है उसके लिए तो एक अलग पोस्ट लिखनी पड़ेगी. वे तो जान है फिल्म की.

इस फिल्म ने जैसे फार्मूला फिल्म वालो से मानो कह दिया हो, “वा देख कबूतर!!”