तिगमांशु धुलिया की फिल्म पानसिंह तोमर सिनेमाघरों में लगी और हर तरफ छा गयी. क्रिटिक्स से लेकर दर्शक सभी इसकी सराहना कर रहे है. ज्ञातव्य हो की तिगमांशु धुलिया, हासिल जैसी बेहतरीन फिल्म बना चुके है. ये अलग बात है की हासिल को बाक्स आफिस पर आपेक्षिक सफलता नहीं मिल पायी थी.

हासिल के अलावा तिगमांशु धुलिया चरस, शागिर्द तथा मियां, बीबी और गैंगेस्टर जैसी फिल्मे बना चुके है. उनकी इन सभी फिल्मो में जो बात कॉमन है वो है प्रमुख पात्र का चित्रण. हासिल और चरस में इरफ़ान खान, शागिर्द में नाना पाटेकर तथा मियां, बीबी और गैंगेस्टर में जिमी शेरगिल, ये सभी पात्र आपको ग्रे शेड्स में ही दिखेंगे. जिससे ये बात साबित होती है की तिगमांशु चरित्रों के चरमरूप होने में यकीन नहीं करते. प्रत्येक मनुष्य के अंदर अच्छी और बुरी दोनों प्रवृति होती है. और कौन सी प्रवृति किसी मनुष्य पर हावी होगी इसका निर्धारण उसके आस-पास की परिस्थितियां करती है. और यही तिगमांशु धुलिया भी दिखाते आये है.

पान सिंह तोमर भी इसकी अगली कड़ी है. ये फिल्म है एक ऐसे धावक कि है जिसने देश के लिए लगातार ७ बार पदक जीते लेकिन बदले में उन्हें सिर्फ पदक ही मिल पाए. पान सिंह तोमर के बहाने निर्देशक ने उनके जैसे ही कुछ विस्मृत नायको को याद किया है जिन्होंने देश के लिए पदको कि भरमार लगा दी लेकिन बाद में हाशिए पर धकेल दिए गए. और जिनकी जिंदगी और मौत दोनों गुमनामी का शिकार हुए. उदहारण में जैसे शंकर लक्ष्मण (चार बार हाकी में गोल्ड मेडलिस्ट जिनकी दवाइयों की कमी से मौत हुयी), के डी जाधव (१९५२ में कुश्ती (रेसलिंग)ओलम्पिक कास्य मेडल जीता लेकिन मौत के समय पैसे के अभाव में ही रहे.), सरवन सिंह (१९५४ में एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक हर्डल्रर जिन्हें अपना गोल्ड मेडल तक बेचना पड़ा), पर्दुमन सिंह (१९५४ में एशियन गेम्स में डिस्क थ्रो में पदक जीता और उनकी जब मृत्यु हुई तो पैसे-पैसे के लिए मोहताज थे.)

पान सिंह तोमर की कहानी इनसे थोड़ी अलग है. ये सिर्फ गुमनामी में नहीं रहे बल्कि बीहड़ के नामी बागी भी रहे. उनकी जिंदगी में आयी परिस्थितियों ने उन्हें समझौता करने का भी मौका नहीं दिया और उन्हें बन्दूक उठानी पड़ी. पगबाधा दौड में दौड़ते-दौड़ते उन्होंने कभी नहीं सोचा था की उन्हें बीहडों में भागना पड़ेगा.

तिगमांशु धुलिया कि फिल्म पानसिंह तोमर दो मायनो से बेहतरीन है. एक सामाजिक-राजनितिक पहलु और तो दूसरा सिनेमाई परिदृश्य. सामाजिक-राजनितिक पहलु से देखा जाए तो निर्देशक के द्वारा उठाया गया मुद्दा काबिले तारीफ़ है. जहाँ एक तरफ भारत में खेल को बढ़ावा देने के लिए नयी-नयी नीतियां बनाने की बात हो रही है , क्रिकेट में पैसे पानी की तरह बहाए जा रहे है तो वहीँ दूसरी तरफ वो खिलाडी जिन्होंने अपने देश के लिए लगातार पदक जीत देश का नाम रौशन किया, उन्हें गुमनामी और गरीबी की जिंदगी जीनी पड़ रही है. और अगर वो कहते है की हम देश के लिए खेले तो बदले में जवाब आता है – “पदक तो मिला न उसके लिए!”

फिल्म के माध्यम से ये सवाल उठाया जाता है कि क्या एक खिलाड़ी के देश के लिए खेलने के एवज में, सिर्फ पदक देकर छुटकारा पा लेना सही है? क्या खिलाडियों की जिंदगी खेल के बाद सिर्फ फाइलों में दिखाने के लिए होती है? और उसके बाद वो कैसे जी रहे है या मर रहे है, इससे देश को कोई मतलब नहीं है? और स्थिति यहाँ तक आ जाती है की उनमे से एक को बीहड़ में बागी बनना पड़ा. जब पानसिंह तोमर ने पदको के माध्यम से आवाज उठाई तो किसी ने उनकी बात नहीं सुनी. और इसलिए उन्हें बन्दूक की आवाज का सहारा लेना पड़ा. जैसा की निर्देशक ने एक संवाद के माध्यम से बताया भी है, जब पानसिंह पत्रकार द्वारा पूछे गए सवाल का उत्तर देते हुए कहते है,”यही तो दुभाग्य है इस देश का. नेशनल चैम्पियन बने साला कौनो ना पूछा, और जब तीन स्टेट की पुलिस को चकमा देकर किडनैपिंग कर लेई तो सारे देश में पानसिंह-पानसिंह नाम हो गवो”.

सिनेमाई पहलु से देखें तो ऐसा कहा जा रहा है की ये फिल्म एक नया ट्रेंड चलाने वाली है. जिसमे रियल लाइफ कैरेक्टर के ऊपर फिल्मे बनाने का दौर शुरू हो सकता है. और अगर ऐसा होता है तो ये भारतीय सिनेमा के लिए यह एक सकारात्मक कदम होगा. अगर विदेशी फिल्मो की बात करें तो वहाँ ज्यादेतर फिल्मे या तो वहाँ के साहित्य पर बनती है या वास्तविक चरित्रों पर. इस दिशा में पानसिंह तोमर को शुरुवात तो नहीं कहा जा सकता क्योकि इसके आलावा राजकुमार संतोषी, रामगोपाल वर्मा और कुछ और निर्देशकों ने वास्तविक चरित्रों पर फिल्मे बनाई है. और जाने माने चरित्रों (जैसे आजादी के सिपाहीयों और प्रसिद्ध शख्सियतों) के ऊपर तो दर्जनों फिल्मे बन चुकी है. लेकिन फिल्म पानसिंह तोमर का एक गुमनाम लेकिन सशक्त चरित्र को परदे पर लाना और इसका दर्शको तथा क्रिटिक्स द्वारा स्वागत किया जाना एक अच्छा सन्देश जरुर दे रहा है.

कुल मिलाकर फिल्म पानसिंह तोमर जहाँ अपने बेहतरीन मुद्दे के लिए सराही जा रही है वहीँ सिनेमा में एक ट्रेंडसेटर के तौर पर भी जानी जा सकती है. सिनेमा समाज का दर्पण है और समाज और जनता के बीच का सबसे सशक्त माध्यम. उस लिहाज से सिनेमा कि अपनी कुछ जिम्मेदारियाँ है, जिसे तिगमांशु धुलिया जैसे निर्देशक ऐसी फिल्मे बनाकर पूरी करते है. उम्मीद है कि इन जिम्मेदारियों का अहसास उन निर्देशकों को भी होगा जिन्हें सिनेमा सिर्फ एक फूहड़ मनोरंजन का माध्यम लगता है.

फिल्म के निर्देशक तिग्मांशु धूलिया और मुख्य अभिनेता इरफान खान और निर्माता यूटीवी मोशन पिक्च र्स एसओएस (सेव अवर स्पोर्टसपर्सन) नाम से एक न्यास की स्थापना करेंगे