“इतना सा चाहिए यहाँ के ब्राह्मणों में खलबली मचाने के लिए. मैंने जो कुछ भी किया मृतक की मुक्ति के लिए नहीं किया, एक जीवित व्यक्ति के मन की शांति के लिए किया. नहीं तो कोगा टूटकर बिखर जाता. ये शास्त्र के अनुरूप नहीं है या नहीं मै इस पर चर्चा नहीं करना चाहता. मेरी अंतरात्मा ने मुझसे कहा की इस छोटे से कर्म से एक शुद्र मानव की आस्था बनी रहेगी, सो मै गया. रूढ़ी और परम्परायें हम तुम स्वयं बनाते है. किसी काल विशेष में परिस्थिति विशेष का सामना करने के लिए समाज और व्यक्ति में संस्कार जगाने के लिए, हम लोग कुछ नियम बनाते है. वो नियमावली उस युग का यथार्थ होती है किन्तु शाश्वत सत्य नहीं. कालान्तर में जब ये अनुशासन बोझिल हो जाता है तो हम तुम उसे काटते है, उतार फेंकते है. क्या समय के साथ हमने अपने रहन सहन को नहीं बदला?अपनी भेषभूषा को नहीं बदला?हमारी शिखाए कट गयी, धोती की जगह पतलून और कमीज आ गयी, किन्तु इससे हमारा ब्राह्मणत्व तो नहीं गया? हठ और संकीर्णता के कारण हमारे समाज में भ्रष्टाचार बढ़ गया है. हम जो कहते है, करते है उसमे विराट अंतर आ गया है. लेकिन सौभाग्य से हमारे बीच कुछ ऐसे लोग है जो कुप्रथाओं का त्याग कर समय के साथ चलना चाहते है. क्या तुम इन प्रश्नों पर विचार नहीं करते?”
“करता हूँ आचार्य निरंतर करता हूँ. और व्यथित होता हूँ. कभी कभी तो मुझे भय भी लगता है.”
“भय लगता है ना ?तो इसे शुभ चिह्न मानो. प्रश्न का उठाना गतिशीलता है. और जो गतिशील है, चलायमान है, वही जीवंत है”

यह संवाद दीक्षा फिल्म में उडुप पंडित और उनके अनुयायी के मध्य है जब उडुप पंडित गावं के एक शुद्र के आग्रह पर उसकी माँ का श्राद्ध करने शुद्रो की बस्ती में जाते है, जिससे गावं के ब्राह्मण वर्ग में असंतोष व्याप्त हो जाता है.
इस संवाद के माध्यम से निर्देशक अरुण कौल अपनी फिल्म का मूल सन्देश बताते है की रूढिया, रीती रिवाज, परम्परायें ये सभी मनुष्यों के द्वारा बनायीं गयी है जिससे समाज सुचारू रूप से चल सके. किन्तु जब यही रीती रिवाज समाज में व्याप्त अनियमितताओंका रूप ग्रहण करने लगती है तो इनका त्याग या परिवर्तन करना ही बेहतर होता है.

दीक्षा फिल्म १९९१ में आयी थी. ये ब्राह्मणवाद, जातिवाद, राजनीति, परंपरा और परंपरा में समय के अनुसार परिवर्तन के बारे में है. उडुप पंडित (मनोहर जोशी) गावं के आचार्य है जो सख्ती से ब्राह्मण धर्म का पालन करते है. लेकिन वो विचारों में रुढिवादी नहीं है. उनकी विधवा पुत्री यमुना उनके साथ रहती है और उस समय के प्रचलन के विपरीत वो उसके मुंडन का विरोध करते है. कोगा (नाना पाटेकर) एक शुद्र है जो उनके यहाँ काम करता है. किन्तु शुद्र होने के बावजूद भी वो मांस या मदिरा का सेवन नहीं करता, उलट वो पंडित जी द्वारा अपने तीन शिष्यों को बताये गए मंत्रो को सुनता है और सीखता है. शिखर उपाध्याय (के के रैना) उडुप पंडित के अनुयायी है और वो कर्मकांडों और रीतियों से ज्यादे सही गलत की नैतिकता में विश्वास रखते है.

फिल्म में मोड़ तब आता है जब यमुना उसके पिता की लंबी अनुपस्थिति के दौरान एक कमजोर पल में गावं के अध्यापक के साथ सम्बन्ध स्थापित करती है जिसके द्वारा उसका गर्भ ठहर जाता है. अध्यापक जिम्मेदारी स्वीकार करने को तैयार नहीं होता. इस विवश परिस्थिति और गावं वालो के तानो से छुटकारा पाने हेतु गर्भपात कराने का निर्णय लेती है.
उधर गाव का एक अन्य पंडित मंजूनाथ (विजय कश्यप), जो आचार्य बनने का सपना देख रहा होता है, उडुप पंडित के खिलाफ ब्राह्मणों को इकठ्ठा करता है और उडुप पंडित को फैसला सुनाने को कहता है. उडुप पंडित निर्णय देने के लिए मजबूर है. वह उसे घटा – श्रद्धा ‘(एक रस्म है जहां एक अनैतिक व्यक्ति जीते-जी मृत घोषित कर दिया जाता है और उसे संप्रेषित कर सभी सांसारिक संबंधों के वंचित कर दिया जाता है) का फैसला सुनते है अपनी यमुना का श्राद्ध करते है. किन्तु शिखर उपाध्याय खुलेआम विद्रोह कर देता है चूंकि वह सोचता है कि वहाँ एक प्यार है इसमें कुछ भी गलत नहीं है. कोगा भी आचार्य के खिलाफ असंतुष्ट हो मुक्ति और मोक्ष को अस्वीकार कर देता है.

कोगा का मानना है की जो ब्राह्मण अपनी बेटी की रक्षा नहीं कर सकता उसे धर्म की रक्षा करने का कोई अधिकार नहीं है. ब्राह्मणवाद के अतिरेक स्वरुप पर व्यंग करते हुयें कोग कहता है, “कोगा को छूने से ब्राह्मणों का जाति जाता. मेरे को हवा छु सकता, आग छु सकता, सूरज छु सकता, लेकिन ब्राह्मण नहीं छु सकता.” कोगा शुद्र होते हुए भी अपने क्रियाकलापों से ब्राह्मण है.

ये एक और मुद्दा उठता है की ब्राह्मण या शुद्र एक पदवी है जिसके कुछ अहर्ताए है. उन अहर्ताओं को पूरा करने के बाद कोई भी मनुष्य ब्राह्मण या शुद्र हो सकता है. लेकिन जरुरी नहीं की जो ब्राह्मण के घर पैदा हो वो ब्राह्मण हो. एक और जगह गावं के ब्राह्मणों द्वारा यमुना पर किये गए अत्याचार को वो कुछ यूँ बताता है, “मै अम्मा को जंगल से बचाया, नाग से बचाया, ब्राह्मण से नहीं बचा सका.”
इसमें कोई दो मत नहीं की निर्देशक ने सामाजिक कुरीतियों पर धावा बोला है और कई प्रश्न उठाये है, किन्तु बहुत से ऐसे प्रश्न है जिन्हें बीच में ही छोड़ दिया है. जैसे यमुना का कर्म दुराचार की श्रेणी में आता है, इसके प्रति समाज का रवैया क्या होना चाहिए? उसे उडुप पंडित के द्वारा एक बार रुढियो से बचाने के बाद इस तरह का व्यवहार क्या स्वाभाविक था? अथवा उडुप पंडित को एक बार फिर अपनी पुत्री के बचाव में आना चाहिए था? और अंत में एक प्रश्न जो उन्होंने किसी के माध्यम से नहीं उठाया, जिसे फिल्म की कथावस्तु और ट्रीटमेंट को ध्यान में रखते हुए उठाया जाना चाहिए था, कि क्या दुराचार सिर्फ यमुना का ही था, अध्यापक का नहीं??

फिल्म दिक्षा उन फिल्मों में से है जो समाज को एक दिशा देने का कार्य करती है. मनुष्य के मन में उठती रहती जिज्ञासाओं को शांत करने का काम करती है, और सबसे ऊपर जो मन मष्तिष्क में प्रश्नों को जगाने का काम करती है. और जैसा कि फिल्म में बताया भी गया है- की प्रश्न का उठाना गतिशीलता है. और जो गतिशील है, चलायमान है, वही जीवंत है!!
“मेरे साथ घर वापस चलना. कोई कुछ नहीं करेगा. भगवान नहीं, प्रेत नहीं, कोई भुत नहीं, ब्राह्मण का मै नहीं कह सकता.”

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