सिनेमा के गिरते स्तर से कितने ही लोगो ने सिनेमा को कटघरे में ला खड़ा किया है. लेकिन मेरा मानना है की अभी भी कटघरे में ‘सिनेमा का गिरता स्तर’ है, सिनेमा नहीं. हम जिस तरह से फिल्मो के जिस वल्गरिटी के बारे में बात कर रहे है वो सिनेमा का एक प्रकार मात्र है. जो की निसंदेह बहुतायत में है. और इन पर सवाल उठाना जायज है.

लेकिन जब सवाल होता तो जवाब आता है की जनता ऐसा चाहती है. मतलब सिनेमा का स्तर नहीं गिर रहा जनता का बौद्धिक स्तर गिर रहा है.

लेकिन मैं इससे बिलकुल सहमत नहीं हूँ. मेरा मानना है की जो जनता को मुर्ख समझता है वो मुर्ख है. अगर जनता मुर्ख होती तो क्वीन या मुन्नाभाई जैसी फिल्मे सफल नहीं होती. इन्हें ये समझ ही नहीं आती.

ये तो कुछ लोगो ने, जिनके पास रचनात्मकता के नाम पर कुछ नहीं है और पैसा बहुत है, उनका रचा हुआ खेल है. एक बाजार बनाकर उसका खेल अपने तरीके से रचकर फिल्मो के हिट होने का खयाली गणित बनाकर उन्होंने सिनेमा को इस स्तर तक ला दिया है. अगर जनता मुर्ख है तो ये उसकी मज़बूरी है. अगर जनता असल में मुर्ख होती तो अच्छी फिल्मे कभी नहीं चलती. अब खुराक में अच्छी चीज़े नहीं मिलेगी तो क्या भूख भी शांत नहीं करें? मै मानता हूँ की मनोरजन भी भूख ही है. और जब ऐरा गैरा खाकर भूख शांत हो जाती है तो वो कहते है की हमें ऐरा गैरा ही पसंद है. ये तो कोई तर्क नहीं हुआ.

अब सवाल है कि बॉलीवुड ने विकल्प क्यों नहीं दिया ? अच्छी फिल्मे क्यूँ नहीं बना रहे जबकि पैसे उससे भी कमाया जा सकता है?? और जवाब है, इसलिए क्योकिं वो दे नहीं सकते. क्षमता नहीं है. और जिनके पास पैसा है उनके पास औकात नहीं है, और जिनके पास औकात है उनके पास पैसा नहीं है. और बाजार का नियम ये कहता है की छमतावान को ‘खरीदकर’ पैसे वाला फिल्मे बनाएगा, तो अब क्या उम्मीद रह जाएगी.

हम सब जानते है कि बकवास चीज़े आसानी से ग्रहण हो जाती है. अच्छी चीजों की आदत डालनी होती है. जिसमे मेहनत लगती है. ठीक जैसे अश्लील साहित्य आसानी से बिकता है और वास्तविक साहित्य से लोग दुरी बनाकर रखते है.

और बाजार हमारे इसी कमजोरी का फ़ायदा उठाता है. लेकिन हम बुद्धिमान क्यों नहीं है? हमें मेहनत करने की आदत क्यों नहीं?

इसमें माँ बाप, गुरु, संगत और समाज का रोल आता है. माँ बाप, गुरु और संगत के बारे में आप जानते ही है. उसकी बात अलग से कर लेंगे. साहित्य, सिनेमा, टीवी, पत्रकारिता इत्यादि समाज के भाग है. इसलिए सिनेमा का भी कर्तव्य है की हमें कुछ ऐसा दिखाए जिससे हम बुद्धिवान हो. लेकिन फिर जैसे ही हम बुद्धिवान हुए, ऐसे लोगो की दुकान बंद हो जाएगी. इसलिए ये बकवास दिखाकर हमे मूढ़ बनाये रखने का प्रयत्न करते रहते है. जो कुछ वास्तविक सिनेमा के पक्षधर समय समय पर हमें इससे निकालने का साहस करते है लेकिन वो भी बाजार का शिकार हो जाते है. जो सबसे लड़कर भी हम तक पहुचते है…उनकी संख्या बहुत कम है.

(वैसे सिर्फ भारतीय नहीं, हॉलीवुड में भी कामिक्स और फेयरी टेल पर फिल्मे बनाकर अरबो कमाए जाते है. लेकिन चूँकि वहां अच्छी फिल्मो की संख्या अधिक है और वहां का दर्शक बुद्धिमान है, ये उनकी कमजोरी नहीं कही जा सकती है.  जहाँ हमारा सिनेमा हमें मुर्ख बनाये रखने में भरोसा करता है, वहां का सिनेमा दर्शको के बुद्धिमान होने पर भरोसा करता है. जो सबसे अच्छी बात लगती है मुझे.

वैसे हम मान भी ले कि वालीवुड, फिल्म ‘इंडस्ट्री’ हो गयी है, तो भी इसमें इंडस्ट्रियल रिफार्म की जरुरत है!