लेख व आकल्पन – भवेश दिलशाद

हिन्दी फिल्मों के संदर्भ में एक राज़ की बात यह जान लीजिए कि हिन्दी फिल्म उद्योग की नींव में बंगाली, मराठी, उर्दू और पंजाबी लेखकों व कलाकारों का योगदान अभूतपूर्व रहा है। यह तक कहा जा सकता है कि इन भाषाओं के कलाकारों ने ही हिन्दी फिल्म जगत का निर्माण किया। हिन्दी के लेखकों और कवियों ने तो बहुत हद तक इस माध्यम को नज़रअंदाज़ ही किया। हिन्दी फिल्मों की बात हो तो हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं की फिल्मों होती है। हिन्दोस्तानी भाषा के रूप में दोनों आपस में ऐसे घुली-मिली हैं कि कोई भेद कर पाना मुश्किल है, खासकर फिल्मों की भाषा के संदर्भ में। वैसे तो, साहित्य पर आधारित फिल्मों की सूची इतनी संपन्न है कि आपको कई बार आश्चर्य हो सकता है। यहां इस साझा साहित्य पर आधारित बेहतरीन और अविस्मरणीय फिल्मों की झांकी देखते हैं।

20. शतरंज के खिलाड़ी – 1977

मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध और कालजयी कहानी पर आधारित इस फिल्म का निर्देशन किया था महान फिल्मकार सत्यजीत रे ने। रे ने सिर्फ दो हिन्दी फिल्मों का निर्माण किया था और दूसरी भी प्रेमचंद की ही कहानी पर आधारित फिल्म थी सद्गति। शतरंज के खिलाड़ी, कला के हर दृष्टिोण से बेमिसाल कही जाती है।

19. धरमपुत्र – 1961

यश चोपड़ा की बतौर निर्देशक यह दूसरी फिल्म थी जिसे हिंदी की सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। यह अभिनेता शशि कपूर की बतौर वयस्क कलाकार व मुख्य भूमिका वाली पहली फिल्म थी। रही बात साहित्य से संबंध की तो यह फिल्म हिन्दी के सर्वाधिक पढ़े गये लेखकों में से एक आचार्य चतुरसेन की कहानी धर्मपुत्र पर ही आधारित थी। विभाजन के समय दो धर्मों के बीच पनपा विद्वेष और धार्मिक उन्माद व अतिवाद इस कहानी के मूल में था।

18. गबन – 1966

मुंशी प्रेमचंद के क्लासिक उपन्यास पर आधारित इस फिल्म के निर्देशक थे महान फिल्मकार ऋषिकेश मुखर्जी। सुनील दत्त और साधना मुख्य भूमिकाओं में थे जबकि इस फिल्म के संगीतकार थे शंकर जयकिशन और गीत लिखे बेहतरीन गीतकार शैलेंद्र और हसरत जयपुरी ने।

17. गर्म हवा – 1973

राष्ट्रीय, फिल्मफेयर और कुछ विदेशी सम्मानों से सम्मानित एमएस सत्यु निर्देशित इस फिल्म को नयी लहर के कला सिनेमा की अग्रदूत और प्रतिनिधि फिल्मों में शुमार किया जाता है। यह फिल्म उर्दू की महत्वपूर्ण लेखिका इस्मत चुगताई की अप्रकाशित कहानी पर आधारित थी जिसे फिल्म के रूप में प्रसिद्ध कवि कैफ़ी आज़मी और शमां ज़ैदी ने लिखा था। विभाजन की त्रासदी की एक ज़बरदस्त कहानी इस फिल्म ने संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत की।

16. सारा आकाश – 1969

 

हिन्दी के प्रतिष्ठित साहित्यकार राजेंद्र यादव के उपन्यास पर आधारित इस फिल्म के निर्देशक थे बासु चटर्जी। यादव जी का यह उपन्यास पहले प्रेत बोलते हैं के नाम से प्रकाशित हुआ फिर हिन्दी के महान कवि रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता से इसका शीर्षक लिया गया सारा आकाश। यह फिल्म मध्यम वर्ग के आंतरिक संघर्ष की कथा कहते हुए एक समय की सामाजिक विद्रूपताओं का खुलासा करती है।

 

15. नदिया के पार – 1982


गोविंद मूनिस निर्देशित यह अत्यंत सफल फिल्म केशवप्रसाद मिश्रा लिखित उपन्यास कोहबर की शर्त के पहले भाग पर आधारित थी। पूर्वी उत्तरप्रदेश की बोलिी और भोजपुरी में इस फिल्म के संवाद लिखे गये और यह सफल प्रयोग साबित हुआ। इसी फिल्म का रीमेक थी 90 के दशक की अत्यंत सफल फिल्म हम आपके हैं कौन।

14. सूरज का सातवां घोड़ा – 1992

 

सम्मानित और प्रतिष्ठित फिल्मकार श्याम बेनेगल निर्देशित यह फिल्म आधारित थी मशहूर लेखक और संपादक धर्मवीर भारती के इसी नाम के उपन्यास पर। यह उपन्यास देवदास की कथा को समाजवादी ढंग से फिर प्रस्तुत करता है जो एकबारगी सर्वथा नया भी लगता है और एक नयी दृष्टि का आग्रह भ्ज्ञी करता हुआ दिखता है।

 

13. सतह से उठता आदमी – 1980

1981 के कान्स फिल्म फेस्टिवल में विशेष रूप से प्रदर्शित की गयी प्रख्यात निर्देशक मणि कौल निर्देशित यह फिल्म हिंदी के चर्चित कवि और लेखक गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानियों पर आधारित थी। मुक्तिबोध के कथा संग्रेह का शीर्षक था सत्ह से उठता आदमी जिसमें एकदम नये ढंग की करीब आधा दर्जन कहानियां थीं। इन कहानियों ने एक नयी ज़मीन की तलाश की।

12. गोदान – 1963

राजकुमार, मेहमूद और शशिकला अभिनीत यह फिल्म आधारित थी कथा और उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद के शायद सबसे अधिक लोकप्रिय उपन्यास गोदान पर। हालांकि एक अच्छे निर्देशक की कमी इस फिल्म को खली लेकिन यह उपन्यास सर्वथा भारतीय साहित्य का गौरव ही महसूस हुआ। टीवी के लिए एक धारावाहिक के रूप में गुलज़ार ने भी इसे 2004 में निर्देशित किया जिसमें पंकज कपूर ने होरी की भूमिका की और सुरेखा सीकरी व व्रजेश हीरजी अन्य भूमिकाओं में दिखे।

 

11. तमस – 1988

 

प्रतिष्ठित फिल्मकार गोविंद निहलाणी इस उपन्यास पर टीवी फिल्म बनायी। मशहूर लेखक भीष्म साहनी लिखित इस उपन्यास का कथानक भारत विभाजन की त्रासदी के इर्द-गिर्द बुना गया। इस उपन्यास के लिए साहनी को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया था। इस फिल्म को दूरदर्शन पर कड़ियों में दिखाया गया और कुछ समय पहले हिस्ट्री टीवी18 पर भी यह फिल्म कड़ियों में प्रदर्शित की गयी।

 

10. उसने कहा था – 1960

मोनी भट्टाचार्जी निर्देशित यह फिल्म आधारित थी हिन्दी साहित्य की एक अमर कहानी उसने कहा था पर। पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी लगभग आधा दर्जन कहानियां लिखकर हिन्दी साहित्य में अमर हो गये और उनकी अमरता का प्रमुख कारण यह कहानी है। हालांकि इस पर बनी फिल्म बिमल रॉय निर्माण के अंतर्गत बनी थी लेकिन निर्देशन की कमज़ोरियों की वजह से यह क्लासिक की श्रेणी में नहीं आ सकी। गुलेरी जी की अद्वितीय कहानी के साथ फिल्म न्याय नहीं कर सकी।

 

9. उसकी रोटी – 1969

 

हिन्दी साहित्य के ज़बरदस्त लेखक मोहन राकेश की इसी शीर्षक की कहानी पर आधारित थी यह फिल्म। निर्देशक मणि कौल की यह पहली फीचर फिल्म थी जिसे फिल्मफेयर में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का क्रिटिक च्वाइस पुरस्कार मिला था। इस फिल्म को नयी लहर के सिनेमा में महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। अपनी कहानी पर बनी इस फिल्म के लिए संवाद भी मोहन राकेश ने ही लिखे थे।

 

8. एक चादर मैली सी – 1986

सुखवंत धड्डा के निर्देशन में बनी यह फिल्म आधारित थी उर्दू के मशहूर उपन्यासकार राजेंदर सिंह बेदी के उपन्यास एक चादर मैली सी पर। इस उपन्यास के लिए बेदी को साहित्य अकादमी पुरस्कार भी प्रदान किया गया था। दिलचस्प यह भी है कि बेदी ब्लैक एंड व्हाइट दौर से ही फिल्मों से बतौर संवाद और पटकथा लेखक जुड़े थे और खुद भी कुछ फिल्मों का निर्देशन कर चुके थे।

 

7. पति पत्नी और वो – 1978

 

हिन्दी सिनेमा के प्रमुख फिल्मकारों में शुमार बीआर चोपड़ा के निर्देशन में बनी यह हास्य प्रधान फिल्म हिन्दी लेखक कमलेश्वर की कहानी पर आधारित थी। कमलेश्वर फिल्मों से बतौर संवाद व पटकथा लेखक जुड़े रहे और मुंबई में फिल्म राइटर्स एसोसिएशन के प्रमुख भी रहे। हिन्दी साहित्य में कमलेश्वर का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता रहा।

 

6. आषाढ़ का एक दिन – 1971

 

यह फिल्म भी हिन्दी के लेखक मोहन राकेश के उपन्यास पर आधारित थी और इसे भी मणि कौल ने ही निर्देशित किया था। इस फिल्म को फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ फिल्म का क्रिटिक च्वाइस पुरस्कार दिया गया था। यह फिल्म संस्कृत कवि कालिदास, मल्लिका और प्रियांगमंजरी के प्रेम त्रिकोण की कथा को प्रस्तुत करती है। यह फिल्म भी कला सिनेमा की एक अनोखी कड़ी है।

 

5. नौकर की कमीज़ – 1991

 

वास्तव में मणि कौल ने अपने समय के हिन्दी साहित्य को फिल्मों में प्रतिष्ठित करने में प्रमुख भूमिका निभायी। कौल निर्देशित यह फिल्म विनोद कुमार शुक्ल के इसी शीर्षक के उपन्यास पर आधारित थी। यह फिल्म और कहानी वस्तुतः भारतीय समाज के वर्ग संघर्ष को प्रस्तुत करती है जो एक विद्रूपता में विलय हो जाता है।

 

4. काली सलवार – 2002

उर्दू के सबसे चर्चित और महत्वपूर्ण लेखकों में शुमार सआदत हसन मंटो की कई कहानियों पर आधारित इस फिल्म का निर्देशन किया था फरीदा मेहता ने। यह वंचित या तिरस्कृत वर्ग की कहानी है। मंटो भी फिल्मों से ब्लैक एंड व्हाइट ज़माने में जुड़े रहे थे और उन्होंने कुछ फिल्मों के लिए पटकथाएं व संवाद लिखे थे। हालांकि उनकी कहानियों पर फिल्म तब नहीं बनी थी।

 

3. उमराव जान – 1981

हिन्दी सिनेमा के परफेक्शनिस्ट निर्देशक मुज़फ़्फ़र अली निर्देशित यह फिल्म आधारित थी मिर्ज़ा हादी रुसवा के उपन्यास पर जो 19वीं सदी में लिखा गया था। यह फिल्म हिन्दी सिनेमा की क्लासिक फिल्मों में शुमार है। इसे आप उर्दू सिनेमा की फिल्म भी कह सकते हैं। इस फिल्म के लिए ग़ज़लें और नग़मे लिखे थे मशहूर शायर शहरयार नेख् जिन्हें खासी लोकप्रियता मिली।

2. चित्रलेखा – 1964

 

दिग्गज निर्देशक केदार शर्मा निर्देशित यह फिल्म आधारित थी हिन्दी साहित्य के दिग्गज लेखक भगवतीचरण वर्मा के इसी नाम के उपन्यास पर। यह चंद्रगुप्त मौर्य की दरबारी नर्तकी और गायिका के इर्द-गिर्द घूमती कहानी को प्रस्तुत करती है। वर्मा को साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा गया था और पवद्मभूषण से भी। उनके इस उपन्यास को केदार शर्मा ने ही दो बार फिल्म में ढाला। पहली बार 1941 में और दूसरी बार 1964 में। 1964 की फिल्म के लिए शायरी साहिर ने रची जो काफी प्रसिद्ध भी हुई।

 

1. दस्तक – 1970

 

राजेंदर सिंह बेदी निर्देशित यह फिल्म उन्हीं की एक कहानी पर आधारित थी। वास्तव में 1944 में रेडियो के लिए बेदी ने यह रेडियो रूपक लिखा नक़्ले-मकानी के नाम से। इसी को विस्तार देकर उन्होंने फिल्म बनायी दस्तक, जिसे उस वक्त समीक्षकों और कलाकारों द्वारा काफी सराहा गया। ऋषिकेश मुखर्जी ने इस फिल्म का संपादन किया और मदन मोहन व मजरूह की जोड़ी ने कालजयी गाने रचे। इस फिल्म को संजीव कुमार की बेहतरीन अदाकारी के लिए भी याद किया जाता है।