लेख व आकल्पन – भवेश दिलशाद

एक पहलू यह है कि हिंदी फिल्मों में पत्रकारों को बेहद मामूली दृश्यों में दिखाया जाता है या उन्हें बतौर मज़ाक के पात्र के तो दूसरा पहलू यह है कि क्या अब पत्रकार समाज के बीच अपनी प्रतिष्ठा सुरक्षित कर पा रहे हैं। इन दोनों ही पहलुओं पर चर्चा जारी है और हिंदी सिनेमा की बात करें तो इस विषय पर कुछ सार्थक फिल्मों को छोड़ दें तो पत्रकार या समाचार जगत को कहानी कहने के लिए एक टूल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, खास तौर से न्यूज़ चैनलों को। दुनिया भर की फिल्मों की बात करें तो 100 से ज़्यादा फिल्में बनी हैं जो अपने विषय के केंद्र में किसी पत्रकार या पत्रकारिता को रखती हैं। लेकिन हिन्दी फिल्मों में यह आंकड़ा ज़रूर बहुत बड़ा नहीं है, फिर भी दो दर्जन से ज़्यादा फिल्में तो इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं ही।

वास्तव में, फिल्म को भी मीडिया का ही एक घटक माना जाता है। अंतर इतना है कि यह क्रिएटिव मीडिया है। समाचार जगत या पत्रकारिता से अपेक्षा की जाती है कि वह तटस्थ रहकर तथ्यगत रहे जबकि फिल्म वास्तविकता के आधार पर कल्पना और विचार की असीम संभावनाओं को अपनी रचनात्मकता के दायरे में रख सकती है। वस्तुतः फिल्मों ने समाचार जगत को केंद्र में रखते हुए कुछ बेहतरीन चित्र दर्शकों को सौंपे हैं जिनमें कुछ यादगार चरित्र भी रेखांकित हो सके हैं। ऐसी ही कुछ चुनिंदा फिल्मों से रूबरू होने का अपना एक आनंद है।

1. न्यू दिल्ली टाइम्स

1986 में आयी रमेश शर्मा निर्देशित इस फिल्म को समाचार जगत यानी पत्रकारिता को केंद्र में रखने वाली सबसे महत्वपूर्ण फिल्म घोषित किया जा सकता है। यह फिल्म जहां मीडिया और राजनीति के कुचक्र को दर्शाती है वहीं, अपने यथार्थवादी मूल्यों के लिए भी सराही जाती है। यह फिल्म मीडिया की ईमानदारी को लेकर सवाल उठाती है और यह महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठा पाती है कि क्या एक पत्रकार उन स्थितियों या विसंगतियों से खुद को अप्रभावित रख सकता है जिन्हें वह कवर करता है। इन तमाम सराहनाओं के बावजूद इस फिल्म का दुर्भाग्य यह था कि इसे वितरकों ने सिनेमाघरों से वंचित रखा और न ही इसे टीवी पर प्रदर्शन की स्वीकृति मिली।

किसी ज़माने में शशि कपूर की छवि ऐसे अभिनेता की रही थी जो गुणवत्ता से अधिक फिल्मों की संख्या में विश्वास करते थे। इसी कारण राज कपूर ने शशि को टैक्सी एक्टर तक कह दिया था लेकिन इस फिल्म में उनके द्वारा निभाया गया न्यू दिल्ली टाइम्स अखबार के पत्रकार विकास पांडे का रोल उनके अभिनय जीवन के सबसे यादगार और बेहतरीन चरित्रों में से एक है। ओम पुरी, मनोहर सिंह और शर्मिला टैगोर के पात्रों को भी सराहना मिली। इस फिल्म ने पत्रकारिता के मूल्यों पर एक लंबी बहस छेड़ी थी जो आज भी बहुत प्रासंगिक लगती है।

2. मशाल

 

1984 में रिलीज़ हुई यश चोपड़ा निर्देशित यह फिल्म एक अखबार के संपादक की कहानी है जो मूल्यगत और ईमानदार पत्रकारिता करता है और एक आवारा व भटके हुए नौजवान को सही दिशा देता है। लेकिन, यह संपादक अपराध जगत के निशाने पर आता है और लगातार हुए हमलों से बिखर जाता है। बाद में, वह खुद एक अपराधी बनता है और फिर वह उस नौजवान को अपने सामने खड़ा पाता है जिसे उसने ही सही राह दिखायी थी। यह प्रतीक है कि छोर बदल जाते हैं और एक मशाल है सच्चाई की जिसे लेकर दौड़ रहा एक मनुष्य गिरता है तो दूसरा थाम लेता है। हिंदी सिनेजगत के संभवतः सबसे महत्वपूर्ण अभिनेता दिलीप कुमार की यादगार भूमिकाओं में से एक है इस फिल्म का विनोद कुमार। इस फिल्म में अनिल कपूर को भी अभिनय के लिए सराहना मिली।

3. जाने भी दो यारो

1983 में प्रदर्शित हुई इस डार्क सटायर फिल्म को हास्य का चोला बखूबी पहनाया गया। कुंदन शाह ने इस एक फिल्म के निर्देशन के कारण अपना नाम बेहतरीन निर्देशकों की सूची में अमर कर लिया। यह फिल्म वास्तव में समाचार जगत के साथ ही, राजनीति, बिज़नेस और ब्यूरोक्रेसी के मिले-जुले आपराधिक षडयंत्रों को मुखरता के साथ प्रस्तुत करती है और इस कुचक्र में पिसते हैं दो युवा फोटो जर्नलिस्ट। इस फिल्म ने भी भ्रष्टाचार के खिलाफ पत्रकारिता के मूल्यों को लेकर बहस छेड़ी और फिल्म इतनी प्रभावशाली सिद्ध हुई कि आज भी इसे प्रासंगिक माना जाता है। इसे कल्ट क्लासिक का दर्जा प्राप्त है।

4. मैं आज़ाद हूं

1989 में रिलीज़ हुई यह फिल्म पत्रकारिता में मौकापरस्ती और पत्रकारों द्वारा झूठी खबरें बनाये जाने के षडयंत्रों का खुलासा करती है साथ ही कहानी के बढ़ते चरण में यह पत्रकारिता के आदर्शवाद को स्थापित करने की कोशिश करती है। टीनू आनंद के निर्देशन में बनी यह फिल्म कहानी, पटकथा और निर्देशन कौशल के लिहाज़ से कमज़ोर लगती है लेकिन पत्रकारिता को केंद्र में रखने वाली फिल्मों की सूची में महत्वपूर्ण मानी जा सकती है। दूसरी ओर, चूंकि यह फिल्म हॉलीवुड की मीट जॉन डो पर ही आधारित थी इसलिए इसे मौलिक भी नहीं माना जा सकता। यह फिल्म भारतीय परिवेश के लिहाज़ से एक अपरिपक्व कहानी कहती है जिसका कोई ज़मीनी आधार ढूंढ़ पाना मुश्किल लगता है। फिर भी अमिताभ बच्चन और शबाना आज़मी की उपस्थिति के कारण यह फिल्म चर्चित रही और तमाम खामियों के बावजूद एक खास फिल्म के रूप में स्वीकार की गयी।

5. दिल से

मणि रत्नम निर्देशित यह फिल्म 1998 में रिलीज़ हुई थी जो आतंकवाद के मुद्दे को उठाती है। एक फिल्म का केंद्रीय पात्र एक पत्रकार है जो रडियो कार्यक्रम के लिए उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र के दौरे पर जाता है और एक युवती से प्रेम कर बैठता है। यह युवती वास्तव में उग्रवादियों में शामिल है। वह उससे बार-बार मिलता है और हर बार उसके बारे में कोई सच जानकर चकित होता है। यह लगभग युद्ध जैसी संकटग्रस्त स्थितियों में प्रेम की कहानी है। पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी लिखित कहानी उसने कहा था के अनुरूप ही युद्ध की पृष्ठभूमि प्रेम कथा को बेहद संवेदनशीलता और प्रतीकात्मकता के साथ बुना गया है। कला के लिहाज़ से एक श्रेष्ठ फिल्म होने के साथ ही यह भी कहा जाता है कि इस फिल्म में प्राचीन अरबी साहित्य में पाये जाने वाले प्रेम के सातों आयाम यानी आकर्षण, सम्मोहन, प्रेम, श्रद्धा, आस्था, दीवानगी और मौत का चित्रण हुआ है। साथ ही, प्राचीन भारतीय नाट्यशास्त्र के रस सिद्धांत पर भी यह फिल्म खरी उतरती है। यह फिल्म अनुसंधानात्मक व जोखिम वाली पत्रकारिता को केंद्र में रखती है और बजाय पत्रकारिता पर कोई विमर्श करने के, उसके माध्यम से अन्य मुद्दों पर विमर्श को आमंत्रित करती है। इस फिल्म में मनीषा कोईराला और शाहरुख खान द्वारा निभाये गये किरदार उनके करियर के सर्वाधिक महत्वपूर्ण किरदारों में शुमार हैं।

6. पेज 3

2005 में रिलीज़ हुई मधुर भंडारकर निर्देशित यह फिल्म बहुत बारीकी से पत्रकारों के जीवन को टटोलती है। मीडिया उद्योग की अंदरूनी परतों को सजगता से उजागर करती यह फिल्म एक महिला पत्रकार के अनुभवों पर केंद्रित है जो पहले मनोरंजन जगत की पत्रकारिता है और नकली लोगों के बनावटीपन से खिन्न होती है। इन स्थितियों से मोहभंग के कारण वह हार्डकोर पत्रकारिता का रुख़ करती है और वहां वह हैरतअंगेज़ अनुभवों से दो-चार होती है। यह फिल्म पत्रकारों के चरित्र और सोच पर विमर्श करती हैख् साथ ही लोकप्रिय मनोरंजन जगत को कठघरे में खड़ा करती है। इस फिल्म में अतुल कुलकर्णी, कोंकणा सेन के अभिनय को भरपूर सराहना मिली और भंडारकर को भी इस फिल्म के कारण बेहद सम्मान मिला।

7. रण

रामगोपाल वर्मा निर्देशित यह फिल्म 2010 में रिलीज़ हुई और इसे पत्रकारिता के उत्तर आधुनिक युग की दुखती रग पर हाथ रखा। न्यूज़ चैनलों के कारोबार को केंद्र में रखती यह फिल्म कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठाने में कामयाब रही। कैसे पत्रकारिता और राजनीति एक-दूसरे से सांठगांठ करते हैं और भ्रष्टाचार में किस तरह से लिप्त हैं, यह पूरा माजरा इस फिल्म ने खोलकर रख दिया। इस फिल्म ने यह विमर्श भी प्रस्तुत किया कि प्रजातंत्र जब रिमोट कंट्रोल से चल रहा है तो क्या सच सबके सामने कभी आ पाएगा। अमिताभ बच्चन, परेश रावल और गुल पनाग के अभिनय को भी सराहा गया। यह फिल्म हमारे समय के मीडिया कारोबार पर बनी एक सार्थक फिल्म कही जा सकती है जो आदर्शवाद को इस तरह स्थापित करती है कि दाग कितना हल्का लगे और कितना कम ज़ाहिर हो।

8. पीपली लाइव

2010 में रिलीज़ हुई अनुषा रिज़वी निर्देशित यह फिल्म जाने भी दो यारो की श्रेणी की डार्क सटायर फिल्म है जिसे कला विशेषज्ञों के साथ ही, दर्शकों से भी स्वीकृति मिली। यह फिल्म किसानों की आत्महत्या के कुचक्र को केंद्र में रखती है और हास्य व व्यंग्य के माध्यम से इस पूरे मामले में मीडिया की भूमिका को हास्यास्पद करार देती है। मीडिया के खोखलेपन और बनावटीपन को उघाड़कर रख देने वाली इस फिल्म ने यह सिद्ध किया कि कभी जनता की आवाज़ मानी जाने वाली पत्रकारिता के मूल्य और स्तर में किस कदर पतन हो चुका है। इस फिल्म को कभी जागरूकता लाने वाली फिल्म कहा गया तो कभी क्लासिक और मास्टरपीस लेकिन बावजूद इसके, इस श्रेष्ठ फिल्म को दर्शक कम मिले।

9. नोवन किल्ड जेसिका

2011 में रिलीज़ हुई राजकुमार गुप्ता निर्देशित यह फिल्म एक प्रसिद्ध वास्तविक हत्याकांड को केंद्र में रखती है। इस हत्याकांड के दर्जनों गवाह होने के बावजूद पीड़ित को न्याय नहीं मिल पाता, तब एक पत्रकार इस केस में बारीकी से अनुसंधान करती है और न्याय व्यवस्था को सही दिशा दिखाने की कोशिश करती है। इस फिल्म ने मीडिया या पत्रकारिता की ताकत को उजागर करने का काम किया और साथ ही यह तार भी छेड़ा कि अगर इसे ईमानदारी के साथ किया जाये तो। कथानक के बीच में पत्रकारिता जगत की कुछ बारीकियों को पकड़ने की कोशिश भी की गयी लेकिन मूलतः फिल्म ने पत्रकारिता बनाम राजनीति को मुख्य विषय चुना और इसे सार्थकता के साथ निभाया। रानी मुखर्जी को एक वास्तविक पत्रकार की भूमिका के लिए कई सम्मान भी मिले और साथ ही, विद्या बालन के अभिनय की भी प्रशंसा हुई।

10. नया संसार

1941 में रिलीज़ हुई एनआर आचार्य द्वारा निर्देशित यह फिल्म संभवतः पत्रकारिता को केंद्र में रखने वाली पहली हिन्दी फिल्म थी। ख्वाजा अहमद अब्बास ने इस फिल्म की कहानी लिखी थी जिसे दर्शकों ने तो खुले दिल से स्वीकारा ही, फिल्म के जानकारों ने भी सराहा। यह फिल्म एक अखबार मालिक द्वारा लाभ के लिए आदर्श छोड़ने पर एक युवा पत्रकार के विरोध को दर्शाती है। यह युवा पत्रकार अपना एक नया अखबार शुरू करता है और पुराने अखबार मालिक को गलती मानने पर मजबूर कर देता है। पत्रकारिता के मूल्यों पर पहली बार इसी फिल्म ने विमर्श छेड़ा था। वास्तव में अब्बास खुद एक पत्रकार थे और फिल्म समीक्षक की हैसियत से उन्होंने एक फिल्म के लिए कड़े शब्द लिखे थे। तब एक निर्माता ने उन्हें चुनौती दी थी कि आलोचना करना आसान है, फिल्म बनाना नहीं। इसके फलस्वरूप अब्बास फिल्म जगत में आये और नया संसार की कहानी लिखी। निर्देशक आचार्य भ्ज्ञी एक पत्रकार रहे थे। यह फिल्म उस समय की साहित्य व कला जगत की क्रांति की सूचक भी थी और नया शब्द का प्रयोग एक स्तर पर प्रगतिशीलता तथा उभरती हुई वामपंथी विचारधारा का प्रतीक भी था।

11. और अंततः

इस पूरी यात्रा के बाद हम कह सकते हैं कि जिस तरह समय के साथ पत्रकारिता की छवि बदली और उसके मूल्य बदले, उसी के हिसाब से फिल्मों में हमने पत्रकारिता के आदर्शवाद, यथार्थवाद को देखा और कभी-कभी पत्रकारिता को कठघरे में खड़ा भी देखा। दूसरी ओर, पत्रकारों ने भी कई बार फिल्मों को कठघरे में खड़ा किया। इस पूरे घटनाक्रम में विषयान्तर न करते हुए कुछ और पहलुओं पर बात करना ज़रूरी है।

पिछले दिनों आयी फिल्म पीके में फीमेल लीड रोल में अनुष्का ने एक पत्रकार का किरदार निभाया है और एक तरह से कहा जा सकता है कि वह किरदार ही फिल्म के कथानक को गति देता है। हालांकि इस फिल्म में पत्रकारिता को केंद्रीय विषय नहीं रखा गया है, बावजूद इसके यह एक बहुत अहम हिस्सा है। इसी पत्रकार का किरदार फिल्म के मुख्य किरदार की समस्याओं का समाधान करता है और इसके लिए पत्रकारिता बनाम धर्म की लड़ाई भी मनोरंजक लड़ाई छिड़ जाती है।

वास्तव में, मणि रत्नम की फिल्मों में पत्रकारिता को खासा महत्व दिया जाता रहा है। बॉम्बे हो या गुरू, पत्रकारिता अपनी पूरी सार्थकता के साथ उभरकर आती है। मणि अपनी फिल्म में मीडिया को किसी कमज़ोर कड़ी के तौर पर नहीं बल्कि पूरी सजगता और जागरूकता के साथ प्रयोग करते हैं। इन फिल्मों में भले ही पत्रकारिता को केंद्रीय विषय न रखा गया हो लेकिन फिल्म के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में इसका उपयोग हुआ है। पत्रकारिता को एक अहम हिस्से के रूप में दर्शाने वाली कुछ उल्लेखनीय फिल्मों में आरोप, मुंबई मेरी जान, मद्रास कैफे, सत्याग्रह, क्रांतिवीर आदि के नाम लिये जा सकते हैं। वहीं कहानी में एक टूल के रूप में मीडिया को इस्तेमाल करने वाली फिल्मों में रंग दे बसंती, लाखों की बात, ए वेनज़डे, रुस्तम और बजरंगी भाईजान का नाम शामिल है। लक्ष्य और फिर भी दिल है हिंदुस्तानी जैसी कुछ फिल्मों में मीडिया केवल ग्लैमर के रूप में इस्तेमाल हुआ है जहां उसके होने की कोई सार्थकता सिद्ध नहीं की जा सकती। बहरहाल, चूंकि मीडिया कई सिरों से हमारे जीवन का हिस्सा बन चुका है और इसे दरकिनार नहीं किया जा सकता तो फिल्मों में भी इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। किसी न किसी रूप में यह विषय फिल्मों में अपनी आमद दर्ज करवाता ही रहेगी लेकिन इस विषय में अभी इतनी संभावनाएं हैं कि कुछ और क्लासिक या श्रेष्ठ श्रेणी की फिल्में हमारे सामने आ सकती हैं।